Friday, March 14, 2014

होली के बदलते रंग


होली ने अपनी दस्तक दे दी है,रंग की मस्ती और माँ के हाथ के बने पकवान बरबस मुझे अपने पैतृक नगर की ओर खीच रही है.अहले सुबह रेलवे की टिकट ऑनलाइन काटी और अब ट्रेन में बैठा अपने मंजिल का इंतज़ार कर रहा हूँ .रांची से मूरी के बीच जंगल और घाटियों में मेरी ट्रेन सरपट दौड़ती जा रही है.बच्चो की तरह मैं भी खिड़की से सजीव दरख्तों को देख अन्दर ही अन्दर आनंदित हो रहा हूँ.अनायास पीछे जाते दरख्तों के साथ मेरी भी मानसपटल पर फ्लैशबैक में पुरानी यादों का समंदर हिलोरे मारने लगा.कुछ १५-२० वर्षो पहले के चित्र मेरे सामने तैरने लगे.होली के एक महीने पहले से ही मन आह्लादित हो जाता था. रात को बिस्तर पर होली की योजनाओं के खयाली पूल बांधते बांधते  कब नींद आगोश में ले लेती पता ही नहीं चलता था.स्कूल जाते वक़्त ये ख्याल होता था की शाम में जब हमारी मित्र-मंडली खेल के मैदान में मिले तो होली को लेकर क्या क्या प्लानिंग की जाये .घडी में चार बजे और बाल मंडली बाहर .आगे की कड़ियों को जोड़ने से पहले बता दूं की बिहार में होलिका दहन को लेकर बहुत जबरदस्त तैयारी की जाती है,महल्लों के बीच ये कम्पटीशन रहता है की किसकी होलिका कितनी देर तक जलती है,यह एक तरह का शक्ति-प्रदर्शन ही था.अब इसी शक्ति प्रदर्शन के लिए जबरदस्त योजनाये बनायीं जाती थी और कई टोलियों का गठन होता था एवं सबकी कार्य एवं दायित्व निर्धारित कर दिए जाते थे .इस वर्गीकरण में आयु वर्ग का खास ध्यान रखा जाता था.बाकायदा सीनियर मेम्बर नौसिखियोंको इसकी ट्रेनिंग देते थे ताकि जब वो उनकी दहलीज़ पर पहुंचे तो उनके सेट किये गए स्टैण्डर्ड को मेन्टेन रखे.विभिन्न टोली लकड़ी और गोबर के उपले या गोइठा के इंतज़ाम में लग जाते थे, इस वक्त चोरी करना भी पाप नहीं समझा जाता था और पकडे जाने पर भी दो बात सुनाने के बाद लकडियाँ मिल जाती थी ,क्योंकि ये एक परम्परा सी बन गयी थी.होलिका दहन का कार्यक्रम टीने-डब्बों के थाप और लोक गीत के अंशो के साथ संपन्न होता और वही से होली का रंग-पोतन शुरू हो जाता था.उस वक़्त,अगर मोहल्ले के किसी के घर अगर कोई दामाद आ गया तो उसकी खैर नहीं,इसके लिए युवा टोली खास तैयारी करती थी.होली के सुबह एक-एक दोस्तों को घर से निकाल कर रंग खेलना और दौड़ना-धुपना.होली के गीतों पर नाचते-नाचते  कब शाम हो जाती थी पता भी नहीं चलता था.शाम में नए कपड़ो में सजे हम दोस्तों के यहाँ उमंग से ओत-प्रोत अबीर-गुलाल खेलने जाते थे ,बड़ों के पाँव पर अबीर रख के आशीर्वाद लेने की होड़ होती थी हमारे ग्रुप में.फिर शौक से गुजियाँ,पूवा और छोले की चक्कलस.और इसी मिठास के साथ अगली होली का फिर से इंतज़ार .
पर वक़्त का पहिया घूमता गया और देखते देखते ये सिर्फ यादों में क़ैद हो गए.हम बच्चे जवान हो गए,अपने पारिवारिक दायित्वों की पूर्ती के लिए जीविकोपार्जन में लग गए.और न चाहते हुए भी हम इनसे दूर होते गए.हम खुली मैदान से वातानुकूलित कमरों में कैद हो गए.हमारे बच्चो के मनोरंजन के पर्याय दादा-दादी की कहानियों के बदले कार्टून-नेटवर्क या पोगो बन गए.गिल्ली-डंडा या क्रिकेट की जगह विडियो गेम ने ले लिया.वो प्राकृतिक आयामों  से दूर काल्पनिक चरित्रों में अपनी खुशी ढूँढने लगे.अब उनके लिए होली का पर्व किसी और एक छुट्टी की तरह होता है और अपने अपार्टमेंट के बच्चो के साथ मौज मस्ती करने में ही होली को बांध लिया है .होलिका अब टी.वी. पर देखने की वस्तु रह गयी,उनके लिए त्यौहार के प्रति उत्साह कम होते जा रहा है .यूँ कहे त्यौहार बूढ़े हो गए,ये व्यंग का पंच नहीं यथार्थ है.हमारे आयु-वर्ग में स्थिती और भी बदतर है.आज हमारे लिए होली अपने पब्लिक रिलेशन को मजबूत करने के एक अवसर के रूप में ही देखा जाता है.हमारी सोच ज्यादा व्यावसायिक हो गयी है,किनके यहाँ जाने से हमे फायदा होगा उसी के अनुसार होली में हम अपने शाम के अपॉइंटमेंट्स निर्धारित करते हैं.
कल और आज के तुलनात्मक विश्लेषण तो ट्रेन पैर बैठे बैठे कर गया ,पर इससे दिल में एक फांस लगी रह गयी.आखिर,हम कहा जा रहें है ,हमारी सोच कहाँ जा रही है.ये फिर मुझे आत्म-मंथन के लिए मजबूर कर रही है .हो सके तो ,आप भी करें.सभ्यता और संस्कृति  हमारे धरोहर हैं,क्या हम इनके साथ न्याय कर रहे हैं.

Sunday, August 11, 2013

नेता जी कहिन!

जाने कितने दिनों के बाद आज फिर अपने गली का सितारा पप्पू दिखा. गुम हो गया था पिछले कई दिनों से,पर ख़ुशी की बात है आज लौट आया .पूरा सीरियस मूड में है.पता चला सीधे बम्बई से लौटा है ,गए थे हीरो बनने! मामले की नजाकत को समझते हुए मेरे अन्दर के खोजी पत्रकार ने कहा चलो मामला एक्सपोज करते हैं.थोडा यही बयार में अपनी काबिलियत का भी झंडा बुलंद कर ले.यही प्लानिंग करते करते चाय की  कड़क घूँट अन्दर किया .नजर उठाई बारह बज चुके थे.पांव में जूते डाले और दौड़ा दी अपनी फटफटिया पप्पुआ के घर की ओर . आयं!ये क्या पूरा गहमा गहमी मची है पप्पुआ के घर में . जैसे ही घर के दरवाजे पर पहुंचा देखा पप्पुआ के बाबूजी मिठाई बाँट रहे है .इ का हुआ ,लगता है पप्पुआ स्टार हो गया क्या ? दिल अन्दर से घबराने लगा ,लगा खोजी पत्रकार की मेरी न्यूज़ सेंस बूट लाने चली गयी है.बिना जानकारी के ही अपना कैमरा चमकाने आ गया .पप्पुआ के बाबूजी नए खादी का कुरता और धोती झाडे हुए कहे आओ आओ पत्रकार बब्बुआ आओ ,तुम भी मिठाई चखते जाओ पता नहीं सुबह से मीठे का दर्शन हुआ हो या नहीं.मैं अवाक् खड़ा रह गया . अन्दर के पत्रकार  ने कहा मलाई पप्पुआ ने काटी   , चमक बाबूजी रहे है ,आखिर क्या बात है.-दुबे जी बजनिया और चौबे जी नचनियां.हलकी सी हंसी मेरे चेहरे पर घूम गयी,मैं  अपने ख्यालों में खोया था की अचानक एक बर्फी का टुकड़ा मेरे होठों को दबाते हुए आगे बढ़ा और मेरी तन्द्रा भंग हो गयी.पप्पुआ के बाबूजी,अपनी बतीसी बाहर किये कह रहे थे लो बचवा ! हमारा पप्पुआ नेता बन गया . मैं हक्का-बक्का  रह गया,गया था हीरो बनने ये नेता कैसे बन गया.हकलाते हुए मैंने पूछा- चाचा अचानक नेता कैसे बन गया .वो बोले ये तो पप्पुए से पूछ लेना,जरुरे कोई चौका छक्का मारा होगा .पप्पुआ की काबिलियत पर अब हमको भी गर्व होता जा रहा था , कसबे का बेटा नेता बन के राजनितिक पटल पर बवाल जो करने वाला था .मैंने भी मन ही मन सोचा अगर पप्पुआ अपनी राजनीती चमका के कही एम.पी/ एम.एल.ए बन गया तो अपनी ही चाँदी है दोस्त की खबर छापने का पहले मौका भी तो मुझे ही मिलेगा.चलो इसी बहती गंगा में हाथ धो कर हम भी स्थापित पत्रकार तो बन जाये , एक स्ट्रिंगर की चाकरी में इंची टेप से नाप के खबर की लम्बाई नापकर मुआवजा लेते लेते  थक गया हूँ .पप्पुआ के चक्कर में रोज़ बाई-लाइन खबर तो मिल ही जाएगी.खोजी पत्रकार को खबर खोजना नहीं पड़ेगा,फोन पर बुलावे के साथ खबर मिलेगी .साथ में एक वक्त में खाने का इन्तेजाम हो जायेगा जी-हजूरी करके नेताजी का.मैं अपने दिवास्वप्न में मगन था .तभी कानो में पप्पुआ की आवाज़ कानो में टकराई क्या बे ,क्या सोच रहा है.सामने देखा तो खद्दर के कुरते पजामे में पप्पुआ पहचान में ही नहीं आ रहा था.जीन्स पहनने वाले गली के छोरे को खद्दर में देखना पच नहीं रहा था.मैंने बोला यार ,तू तो एक दम बदल गया.अचानक कौन सा तीर मारा की हीरो बनते बनते नेता बन गए . वो बोला छोड़ ये लम्बी कहानी है. मैंने आदतन उससे सच्चाई उगलवाने के लिए जी तोड़ मेहनत करने लगा.नेता जो है ,बड़ा ही डिप्लोमेटिक उत्तर दिया –“तुम पत्रकार और हम नेता दोनों मजबूरिये में बनते है ,कही कौनो सहारा न मिले तो पत्रकार बन जाओ या फिर दो सेट खादी का सिला के नेता बन जाओ ,कौनो कम्पीटीशन थोड़े पास करना है .मजाक में ही उसने सारा दर्द एक लाइन में उड़ेल दिया .
सच्चाई ही है आज  कोई माँ-बाप ये नहीं चाहता उसका बेटा राजनीति में कदम रखे ,न ही युवा चाहता है. शेष आप खुद ही समझ सकते हैं.कमोबेश यही स्थिति पत्रकारिता को ले कर होती जा रही है , इस क्षेत्र में नैतिकता की गिरावट और कम  वेतन-भत्ते की लाचारगी ,बिना बोले हर कुछ बयां कर देती है.८०% से ज्यादा पत्रकार स्ट्रिंगर के रूप में सेवाएँ दे रहे है ,जिन्हें न कोई वेतन मिलता है न सुविधाएँ ,मिलती है तो खबर की लम्बाई नापकर चंद रुपये .पप्पुआ सही ही कह गया –ये बेचारगी में डूबते को तिनके का सहारा है !

Friday, August 24, 2012

व्यवसायिकता के भंवर जाल में फँसा "मैं "

आज मै अपने व्यवसायिक जिंदगी में खो सा गया हूँ.अपनी पहचान को स्थापित करने के चक्कर  में अपने आप को गवां बैठा.आत्ममंथन करता हूँ- इस "मैं" से साक्षात्कार करने के लिए लगता है मानो  सिग्नल ही कमजोर है ,लिंक बैठ ही नहीं पा रहा.मर्ज लाइलाज तो नहीं, लेकिन गंभीर जरूर मालूम पड़ता है. अपने संस्कारो में इमानदारी और स्वाभिमान उपहार में पाया.व्यावसायिक ध्रुव के मैले वातावरण में खुद को बचाए रखेने कि जद्दोजहद रोज करनी पड़ती है.संस्कार तो बच गए धूमिल होने से, लेकिन कर्तव्यपरायणता के भार  तले अपने अंदर के स्वाभाविक मनुष्य को खो बैठा.उसे आवाज़ देने कि कोशिश कि,लेकिन पाया वो तो मुझसे कोसो दूर खड़ा है.उसे अपने करीब लेन  के लिए अनुनय किया,परन्तु परिणाम सिफर ही रहा.मेरे बिछड़े हुए "मै" ने मुझसे पुछा - अपने कार्यजीवन को सफल बनाने में तुमने मुझसे धोखा क्यों किया?क्यों अपने अंदर के रचनात्मकता को बेमौत मार डाला?क्यों अपने शारीरिक अवस्था को खराब करता गया?क्या तुम्हारे  काम को वो पहचान मिली जिसकी तलाश थी,लाख प्रयास के बाद भी तू वही खड़ा है,फिर क्यों तुमने अपने प्राकृतिक मनोभाव कि तिलांजलि दे डाली.आज मै किनकिर्तव्यविमूढ खड़ा था.मेरे पास जवाब थे ही नहीं.घुटनों के बल बैठा,आँसू बहा रहा था.अपने आप को खोने का गम खाए जा रहा था.
एक विराम,फिर फ्लैशबैक में मेरे आँखों के सामने गुजरे पल के छाया चित्र चल पड़े.उसे अपने समझ के छन्ने से छानने का प्रयास करने लगा.कार्यस्थल पर अपने पहले दिन को देखा-एक उम्मीदों से भरा नवजवान ,जो कम क्षमता होते हुए भी अपने आपको स्थापित करके खुद को एवं परिवार को संतुष्ट करने का सपना पाल रखा है.सहकर्मियों के व्यव्हार से खिल उठा ,लगा पाने को आसमान है और खोने को कुछ नहीं.भावनाये कुलांचें मारने  लगी .कुछ दिन बीते ,तो शायद इस कोरे मानसपटल पर ओछी राजनीती ने  कुप्रभाव डाला.ऊपर से मीठी बातें करने वाले सहकर्मी,पीठ पीछे धोखा देते दिखे.उसके छोटे छोटे गलतियों को भी स्व-हित के लिए भुनाया जाने लगा.पर वो इन सबसे बेखबर काम करता गया.क्यूँकि,उसने ऐसे संस्कार पाए ही नहीं थे और शायद  इसलिए वो सहकर्मियों के दुर्भावना को समझ नहीं पाया.जब तक समझता,देर हो चुकी थी .पर संभलना ही जिंदगी का पर्याय है.सँभालने के चक्कर में ,अपने जीवन के आवश्यकताओं  को भूलता गया और काम के पीछे समर्पित हो गया.चाहे वो काम उसके लायक हो या नहीं.मेहनत रंग लायी ,उसके प्रयास को सराहा गया .लेकिन अपने को ज़माने के प्रयास में वो अपने अंदर के व्यक्ति से दूर होता गया.उत्साही नौजवान हतास हो चूका था.उसकी खुशमिजाजी उसका ही मजाक उड़ा रही थी.रोज सुबह उसकी अंतरात्मा से दो-दो हाँथ होती.किसी तरह अपने आपको वो कार्यस्थल के बाजिगारियों से सामंजस्य बिठाने ले के चल पड़ता.शाम को निढाल हो पड़ जाता.उसके पास कुछ करने कि शक्ति नहीं होती .इसी दैनिक उहापोह में अपने आपको तलाश करने कि कसमकस अभी भी जारी है.इस मनोभाव को शायद  गज़ल कि ये पंक्तिया अक्षरसः परिभाषित करती है-
"एक आह भरी होगी,तुमने न सुनी होगी,
जाते जाते तुमने,आवाज़ तो दी होगी ,
हर  वक्त यही था गम,उस वक्त कहा थे  हम
जहाँ तुम चले गए!"
ये गंभीर अभिव्यक्ति व्यवसायिकता के भंवर में फंसे सभी जनों को समर्पित है.ये एक "सार्थक प्रयत्न "उन्हें नींद से जगाने का है जहाँ वो अपने सपने के उड़ान में खुद को खोते चले जा रहे है.

Thursday, May 24, 2012

तेल की मार ,पप्पुआ बीमार !

बहुत खुशी कि बात है,पप्पुआ सुधर गया . अक्ल ठिकाने आई ,मेहनत रंग लायी और आख़िरकार एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में प्रतिष्ठित पद भी मिल गयी .अब भाईसाहब का इमेज फिर से इलाके में चमक गया.आखिर गली के लाल ने कमाल ही कर दिया था.पप्पू जी अधिकारी तो बन गए पर उनका  स्टायलिश नेचर अभी भी टका-टक था .जब दबंग के सलमान कि तरह काला चश्मा पहन  ऑफिस निकलते थे ,सबके मुँह से एक मीठी आह निकल ही जाती थी.मित्रमंडली ने समझाया एक  झक्कास बाईक ले लो फिर तो तुम्हारे स्टायल -स्टेटमेंट के सामने सब ढेर हो जायेंगे.अब पप्पू के सपनो में एक खूबशूरत बाईक रोज दस्तक देने लगी.जनाब को बाईक से नया नया इश्क जो हुआ था.
अभी नौकरी लगे दो-तीन महीने हुए थे,इतनी जमा पूँजी तो नहीं थे कि बाईक अपने दरवाजे पर तुरंत बाईक ला के लगा दे. दोस्तों ने लोन पर गाड़ी लेने को उकसाया.एक हफ्ते के अंदर ही चका-चक पल्सर बाईक दरवाजे पर  आ गयी.अब तो मौज थी ,जब पप्पू जी तैयार होके पल्सर पर निकलते लड़किया इन्हें ही घूरने लगती.पप्पुआ चक्कलस करने लगा .उसकी पोजीसन भी समाज में झक्कास हो गयी. उसके बाबूजी भी बड़े शान से पप्पुआ कि शानो-शौकत कि कहानी चौक  के पान दुकान पर बड़े चाव से सुनाने लगे.
आज बाईक लिए दो महीने हो गए.पप्पू से अपने सभी दोस्तों को बाईक के दो महीने पूरे होने  के उपलक्ष्य में दावत पर बुलाया.सारी तैयारी हो चुकी है,धमाके दार संगीत के बिच भोजन चल रहा था.तभी तिन्कुआ ने टी.वी चालू कर दी. ब्रेकिंग न्यूज आयी,पेट्रोल साढ़े सात रूपये महंगा हो गया .पप्पुआ  के हलक में कबाब का टुकड़ा  अटक गया.पार्टी मातम में तब्दील हो गयी.महंगाई कि मार ने कमर तोड़ दी थी.पप्पू के आँखों से अविरल आँसुओं के धार बहने लगे.अब कैसे चलेगी बाईक, बजट फेल हो गया.दोस्त ढाढस बंधने लगे. सब ने एक स्वर में कहा,कुछ न कुछ तो रास्ता जरुर निकलेगा.
रात गयी बात गयी. सुबह मायूसी से पप्पू बाईक पोछने में लगा था.तभी टिंकु दौड़ता हुआ आया और बोला ये देख अखबार ,अब आसान किस्तों पर बैंक ने पेट्रोल लोन देने कि घोषणा कि है.अब रोने कि बात नहीं,लड्डू बटवा दो सारे  सेहर में.फिर शान से दौडेगी पल्सर पुरे शहर  में.दोनों तैयार  होके  बैंक कि ओर  दौर पड़े.लेकिन ये क्या ,वह तो पहले से ही सैकडो आदमियो की लाइन लगी थी.घंटो इंतज़ार के बाद भी उनका नम्बर नहीं आया.भूखे-प्यासे पप्पू को चक्कर  आया  और वो वही ढेर हो गया.आँख खुली तो अपने परिवार और दोस्तो से घिरा अस्पताल में पाया. बिन बोले वो मंद-मंद मुस्कुराने लगा.माँ ने पुछा  बिमार हो और मुस्कुरा रहे हो?पप्पू ने हँसते हुए जवाब दिया -महंगाई ने पेट्रोल में आग लगायी,और इसने मेरे सपनो के संसार को ही जला दिया.अब तो एक ही रास्ता है-एक मस्त सायकिल खरीद लेता हूँ,सरकार पेट्रोल का दाम बढ़ा सकती है पर टायर में भरे जाने वाली  हवा तो मुफ्त है,सरकार कि कोई चलती नहीं उस पर!तो चलो आज ही सायकिल लेले .सभी ने ठहाका लगाया,पर इस हँसी में दर्द था,महंगाई कि मार का दर्द .

Sunday, January 1, 2012

नवजात कोपलें

नए साल के आगमन पर एक नयी सुबह ने दस्तक दी रोज़ की तरह अख़बार के पन्नो पर नज़र दौडाई, वर्ष २०१२ के पदार्पण से जुडी असंख्य खबरे मिली ये अखबारी फलसफा पिछले २०-२५ साल से निरंतर मेरे नज़रों के सामने से गुजरता रहा है पिछले साल के मुल्यांकन,संस्मरण,यात्रा-वृतांत, ज्योतिषीय गणनाओ और हार्दिक शुभकामनाये रूपी विज्ञापनों से सारा अख़बार पटा रहता है इन्ही मानसिक विश्लेषण में उलझा हुआ मै अपने घर के बागान में पहुंचा सहसा मेरी नज़र एक ठूंठे पौधे पर उग आयी नयी कोपलों पर ठहर गयी उस सूखे पौधे पर दो नए हरे कोपल ज़िन्दगी की नयी आशा ले कर आई थी नए साल के आगमन पर इस प्रतीकात्मक नव-सृजन और नवचेतन की परिकल्पना मेरे दार्शनिक मन में हिलोरे मारने लगी. जैसे इस पौधे के लिए ये नवजात कोपलें नए जीवन के सम्भानाओ को लेकर आई है,वैसे ही नया साल का पहला दिन जो नवजात है हमारे वैश्विक विकास और व्यक्तिक विकास की असीम सम्भावनाये लेकर आया है कुछ बाधाएँ है,कुछ सम्भावनाये है पर इन सबसे ऊपर हमारी दृढ इच्छा -शक्ति है जो बाधाओं को लाँघ कर असीम सम्भानाओ को सच्चाई के धरातल में पहुंचा सकता है,यानि उसके साकार स्वरुप का दीदार करवा सकता है
जैसे हर एक सुबह नयी आशा के किरण के साथ शुरू होती है,वैसे ही आज हम नए साल में उम्मीदों के लम्बे लिस्ट के साथ अपना पहला कदम रख चुके है।अपने निजी और व्यावसायिक दायित्वों के निर्वहन और कुछ नया करने की चाहत मन में तरंगो की तरह अपनी आभा भिखेर रही है। मन इसी भंवर-जाल में फंसा है। अब प्रश्न उठता है, सबकी योजना,सोच और जरुरत अलग-अलग है और क्या बाज़ार में बिकने वाले लेख और किताबें समस्त जन मानस के मानसिक उद्गारों का चित्रण कर सकती है। बुक-स्टाल पर असंख्यों प्रेरक किताबें बिखरी पड़ी है, पर सब के लिए कोई एक फ़ॉर्मूला किसी के पास नहीं है। अगर मेरी माने तो इन सब का फ़ॉर्मूला हर किसी इन्सान के मष्तिस्क में कोडेड रहता है , मामला अटक जाता है इसके इनकोडिंग करने के कारण। संचार सिधान्तो की अगर माने तो इनकोडिंग की प्रक्रिया हर मनुष्य के ज्ञान,कुशलता,जानकारी एवं सामाजिक और आर्थिक परिवेश के मानदंडो पर आधारित होती है। अगर हम अपने इर्द-गिर्द के समाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक छन्ने से छानने का प्रयास करे तो हमारा मस्तिक में फिट फ़ॉर्मूला इनकोड हो सकता है। भूल हो जाती है की हम इसे जानने की इच्छा ही नहीं करते। हमारी इच्छा - शक्ति मर चुकी है,जरुरत है इसे जगाने की। तभी हम मानस पटल पर उग आये नयी कोपलों और सोंच को अमली जमा पहनाने में शायद कामयाब हो सकते है। वर्ष बदला,सोच बदली अब उस सोच को धरती पर उतारने की कवायद करनी है। सबकी उन्नति की प्रार्थना और नव वर्ष आगमन की हार्दिक बधाइयों के साथ अपने अभिव्यक्ति को विराम देता हूँ।
आशा करता हूँ मेरा" ये सार्थक प्रयत्न "आपके इच्छा -शक्ति को जगाने में कुछ मददगार सिद्ध हुआ हो

Tuesday, December 27, 2011

कोरा ज्ञान करे कल्याण!

बहुत दिन हुए ,शहर की गलियों में नहीं घूम सकाआज सोचा चलो सर्दी के साथ साथ थोड़ी जोर आजमाइश कर लेनिकला विरानियों की खाक छानने के लिएगली के कोने में चाय दुकान पर जबरदस्त भीड़ थीमामला ठण्ड का था,चाय की चुस्कियों के साथ शहर की गोस्सिप वातावरण में गर्मी फैला रही थीबे-सर पैर के लॉजिक कानों के बगल से गोलियों की तरह गुजर रहे थेअनायास ही मुझे साहित्यकार वनमाली का दिया दृष्टान्त याद आया जहा उन्होंने रेल के डिब्बे में कई संस्कृतियों और सोच के मिलन को समाज की प्रतिकृति बताया थाएक समय लगा मनो मै वनमाली जी की सोच को दुकान की भीड़ में प्रतिबिंबित होते देख रहा हूँउनकी लाज़वाब दार्शनिक सोच ने मेरे चेहरे पर एक मुस्कान बिखेर दीतन्द्रा भंग कर आस-पास की बतों को समझ के छन्ने से छानने के प्रयास में लग गयाकही राजनीतिक उठापटक,कही फ़िल्मी गप और कही सचिन के महाशतक की संभावनाओ पर कयास-चाय की चुस्कियों के आनंद को दुगना करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे. यही मनोभावों की अभिव्यंजना की मुल्यांकन का अभूतपूर्व अनुभव प्रतीत हो रहा था
उस भीड़ में एक बुद्धिजीवी सा दिखने वाला अपनी बतों को मनवाने में लगा थाउसके कुछ चमचे उसके दही में सही मिला रहे थेमेरा ध्यान उस ओर खीच गया , बातें किसी प्रतिष्ठित परीक्षा में पूछे गए प्रश्न को लेकर हो रही थीमहाशय अपने कयासों के बयान चला रहे थे और खोखले अनुभव के आड़ में कड़ाके की सर्दी में रंग जमा रहे थेमामला उनके पक्ष में जाता दिख रहा थाउस समूह में एक चुप-चाप दिखने वाला नवयुवक अपने अनद्रोइड मोबाइल में छेड़खानी कर रहा थासहसा वो चिल्लाया- सरजी आपकी लॉजिक बकवास है,गूगल तो कुछ और ही कहता हैइन्टरनेट के युग में महशय की बोतलेबाजी की बत्ती गुल हो गयीऐसा लगा, महाशय के सर मुंडाते ही ओले पड़ेइन्टरनेट के पन्नो ने उनकी पोल खोल दी थी,अब चमचे भी मूंह छिपा के हँस रहे थेकहे तो लोकल भाषा में उनकी पोजीशन की व्हाट लग गयी थीमै भी मंद-मंद मुस्कुराता हुआ निकल पड़ासच ही कहा गया है आधा ज्ञान कोरा हैबिना जानकारी के हांकने से प्रतिष्ठा भी दामन छोड़ देती है।कोरा ज्ञान करे कल्याण!

Saturday, October 15, 2011

हिसार में अन्ना का तड़का

गलियाँ हरियाणा की हो और दाल में तडके की महक आये ये असंभव ही होगाहरियाणा की दाल और "लाल" पुरे भारत में प्रसिद्ध हैयहाँ की राजनीति हमेशा तीन "लाल" ध्रुव के बीच घुमती रही-देवीलाल,बंसीलाल और भजनलालइन्ही तीन "लाल" की राजनितिक दाल यहाँ गलती आयी हैवक्त बदला,फिजा बदली और राजनितिक समीकरण भी बदलेहिसार उप -चुनाव इसका जीता जगता उदाहरण बन गया और लग गया हरियाणा की राजनितिक दाल में "अन्ना का तड़का"। ये तड़का कांग्रेस को तीखा लगता दिखाई पड़ रहा हैकांग्रेस की हिचकिया विपक्षियो के दिल में खुशहाली पैदा कर रही हैदबी जुबान में कांग्रेस को जोर का झटका धीरे से लगा मालूम पड़ रहा हैमतपेटियो में जनमत बंद पड़ा है, चारो तरफ कयासों के तीर चल रहे हैजीत का ऊंट किस करवट बैठेगा ये तो समय बताएगा पर टीम अन्ना का कांग्रेस के खिलाफ अभियान उनकी नींद हराम करने में कामयाब हुई है

मुकाबला त्रिकोणीय है, भाजपा समर्थित हरियाणा जनहित कांग्रेस ने भजनलाल के मृत्यूपरांत खली सीट पर उनके बेटे कुलदीप बिश्नोई को जनता के भावनात्मक अभिव्यज्नाओ को भुनाने के लिए उतरा है, वही आई एन एल डी ने देवीलाल के पोते और प्रकाश चौटाला के बेटे अजय चौटाला को मैदाने जंग में उतारा हैकांग्रेस भी कम नहीं थी , उसने हूडा के खासमखास रहे पूर्व सांसद जय प्रकाश को चुनावी समर में उतारापर सारे समीकरण धरे के धरे रह गए जब टीम अन्ना के कांग्रेस के खिलाफ अपना बिगुल फूँकाचुनावी गणित चरमराने लगी, अगर एक सुर्वे की बात मने तो २५% जनता इस अभियान से प्रभावित होकर वोटिंग कियाये तथ्य अगर सही है तो चौकाने वाला हैपर सिक्के का दूसरा पहलु यह भी है की कांग्रेस विरोधी वोट गए किस खेमे मेंअगर वोटों का ध्रुवीकरण एक तरफ होकर कांग्रेस के विरोधी दो मुख्य ध्रुवों में हो गया तो भी चुनावी समीकरण गड़बड़ा सकते है और कड़ी टक्कर की आशा की जा सकती हैयह लोकतंत्र के धरातल पर "टीम अन्ना" का लिटमस टेस्ट भी हैअगर "टीम अन्ना" भारी पड़ी तो आने वाले दिलो में राष्ट्र की राजनितिक परिदृश्य में कई बदलाव देखने को मिल सकते है

मौके पर छक्का मरने में रामदेव की सेना भी पीछे रही,उसने भी बाबा पर रामलीला मैदान में हुए अत्याचार को भुनाने में कोई कसार नहीं छोड़ीहिसार में कई जगह सभा कर,उसने भी कांग्रेस की नीव हिलाने में खून-पसीना लगा दिया

ये तो सतही बातें हुई,पर टीम अन्ना का अभियान अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ है तो निशाने पर सिर्फ कांग्रेस ही क्यों,बाकि की पार्टियाँ क्या दूध की धूलि हुई है? यह यक्ष प्रश्न है?अगर हिसार में तीन मुख्य उम्मीदवारों के संपत्ति के विवरण का अवलोकन करे तो एक नया ही कलेवर निकलता हैएसोसियशन ऑफ़ डेमोक्रटिक रिफोर्म्स के डाटा के अनुसार-कुलदीप बिश्नोई के पास ४८.८५ रुपये की चल-अचल सम्पति है ,वही इनके ठीक पीछे पीछे अजय चौटाला लगभग ४० करोड़ रुपये के चल -अचल सम्पति के साथ दुसरे पायदान पर हैवहीँ कांग्रेस के उम्मीदवार जय प्रकाश के पास लगभग .१६ करोड़ रुपये के चल-अचल संपत्ति के मालिक हैजनता के होनेवाले संभावित सेवक करोडपति हैयहाँ विचार करने योग्य बात ये है ,अगर "टीम अन्ना" भ्रष्टाचार के
खिलाफ खड़ी है, तो किसी पार्टी विशेष के बजाये सभी भ्रष्टाचारियो के खिलाफ आवाज़ क्यों नहीं उठा रही और "राईट टू रिकाँल " आप्शन के लिए आन्दोलन क्यों नहीं कर रही!

अगर मेरी राय माने तो , वोटिंग मशीन में उम्मीदवारों के सूचि के साथ "इनमे से कोई नहीं" विकल्प डालने का वक्त गया हैभारतवासी जागेंगे तो ये भी हमें जल्द दिखने को मिलेगा और "टीम अन्ना" को भी शायद राजनितिक दाल में तड़का लगाने के लिए मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी